जन्मदिन विशेष :: राजेश्वर झा (25.04.1923 – 23.04.1977)

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मिथिला-मैथिली के विलक्षण अन्वेषक :: राजेश्वर झा

राजेश्वर झा ( 25.4. 1923- 23.4.1977) एक प्रसिद्ध साहित्यिक इतिहासकार छलाह । हिनक जन्म मिथिला क सहरसा सम्प्रति सुपौल जिला क रसुआर गाम मे भेल छल. रसुआर निर्मली रेलवे स्टेशन से पूर्व क दिशा मे अवस्थित अछि । 1 9 41 मे मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण केलक बाद, वो दरभंगा राज मे सर्वप्रथम बौसी सर्कल तत्पश्चात बिभिन्न पद पर कार्य केला . 1 9 52 मे बिहार रिसर्च सोसाइटी मे शामिल भेला आ कार्यालय सचिव के रूप मे हिनक मृत्यु भेलैन्ह । सब मिलाके वो मैथिली आ हिंदी मे 20 पुस्तक लिखलैथ । मिथिला आ इंडोलॉजी पर हिनकर लेखन क एखनो मूल्यवान मानल जायत अछि । संस्कृत क हिनक ज्ञान पूरl-पूरी आ ठोस छलैन्ह । वो मैथिली साहित्य संस्थान क तरफ से एक शोध पत्रिका- मैथिली भारती सेहो संपादित केला । अवहट्ठ : उद्धभव ओ विकास साहित्यिक इतिहास पर हिनकर प्रमुख कार्य मे से एक अछि , जे हुनकर गंभीर अध्ययन आ तार्किक विश्लेषण क शक्ति द्वारा दर्शायाल गेल अछि । 1 9 77 मे हिनका अहि पुस्तक पर साहित्य अकादमी वार्षिक पुरस्कार भेटल।

पं. राजेश्वर झा :: व्यक्तित्व ओ कृतित्व
(मिथिला मिहिर,1978/’अखियासल’मे संकलित)

साहित्यकारक व्यक्तित्वकेँ बूझब सर्वप्रथम आवश्यक अछि। बिना व्यक्तित्वकेँ बुझने कृतित्वक तहमे जाएब सम्भव नहि होइछ। व्यक्तित्वक निर्माण परिवेशसँ होइछ आ तें कृतित्वक माध्यमसँ रचनाकारक परिवेशकेँ सेहो बूझल जा सकैछ। साहित्यकारक व्यक्तित्व जाहि तरहक रहैछ, ओ जतेक प्रखर रहैछ, जतेक संघर्षशील रहैछ, ओही अनुपातमे ओहि रचनाकारक साहित्य समक्ष अबैछ।
पंडित राजेश्वर झा मातृभाषाक सर्वतोमुखी विकासक लेल संघर्षरत सेनानी साहित्यकारक अगिला पाँतीमे विराजमान रहलाह। हिनक एहि सक्रियताक दिशा रचनाकारकेँ प्रेरित करबाक दिश विशेष छल। लोककेँ साहित्य-रचना लेल प्रेरणा भेटौक अथवा कोन प्रकारक पोथीक आवश्यकता मैथिली साहित्यक लेल बेशी छैक, राजेश्वरबाबू सदिखन प्रयत्नशील रहैत छलाह। एही सक्रियताक प्रतिफल थिक जे राजेश्वरबाबू अपन रचनात्मक जीवनक अल्पवयमे अनेको पोथीक रचना कए सकलाह। मैथिली पोथी प्रकाशनक जे समस्या अछि से ओ नीक जकाँ अनुभव करैत छलाह। तथापि मातृभाषाक भंडारकेँ विभिन्न विधाक पोथीसँ भरबाक लेल ओ कोनो ने कोनो पोथी प्रकाशित करिते छलाह। मातृभाषाक वलिवेदीपर अपन अर्थक आहुति चढ़बिते छलाह। ‘मिथिलाभारती’ सन शोध पत्रिकाक प्रकाशन हो किंवा ‘मैथिली साहित्य संस्थानक’ साहित्यिक कार्यक्रम, हुनकहि सत्प्रयासक प्रतिफल छल। एक युगक सर्जनात्मक अवधिमे दू दर्जनक करीब पोथी? विभिन्न विधामे लिखि प्रकाशित कए लेब सामान्य बात नहि थिक। पुस्तक लेखन-प्रकाशनमे ओ ततेक पकिया छलाह जे घोषित तिथिक अन्दरे पोथी लिखि, विमोचन करा लैत छलाह।

राजेश्वर झाक कृतिक विभाजन तीन कोटिमे कएल जा सकैछ। पहिल कोटिमे अबैछ अनुसन्धानपरक पोथी, दोसर कोटिमे अछि ऐतिहासिक वा पौराणिक कथाक आधारपर लिखित पोथी तथा तेसर कोटिमे अछि सर्जनात्मक। अनुसन्धानपरक पोथीमे अबैछ : ‘मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास’, ‘मैथिली साहित्यक आदिकाल’, ‘अवहट्टक उद्भव ओ विकास’, ‘पूर्वाञ्चलक मध्यकालीन वैष्णव साहित्य’ तथा ‘लोकगाथा विमोचन’। ‘पूर्वाञ्चलक मध्यकालीन वैष्णव साहित्य’ हिनक अन्तिम प्रकाशित कृति थिक। ‘अवहट्टक उद्भव ओ विकास’ वर्ष 1976 मे मरणोपरान्त साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत भेल। ऐतिहासिक किंवा पौराणिक कथाक आधारपर लिखित पोथीमे अछि – ‘महाकवि विद्यापति नाटक’, ‘शास्त्रार्थ नाटक’, ‘कन्दर्पी घाट नाटक’, ‘विद्याधर कथा’, ‘उर्वशी’, ‘मेनका’, ‘धर्मव्याध कथा’, ‘जट-जटिन’, एवं ‘श्याम-चकेवा’ आदि। तेसर कोटिक पोथीमे अछि – ‘दुखिया बाबाक खटरास’, ‘अपरिणीता’ आदि। एहि प्रकारक पोथी राजेश्वर बाबूक सर्जनात्मक प्रतिभाक द्योतक थिक।

मैथिली साहित्यक इतिहासकेँ सामान्यतः सिद्ध लोकनि द्वारा रचित, विशेषः शरहपादक साहित्यक आधार पर सप्तम- अष्ठम शताब्दी धरि लए गेल जाइछ। मुदा राजेश्वर झा एहि स्थापनासँ सहमत नहि छथि।

अपन अनुसन्धानक आधारपर ओ मैथिली साहित्यक आदिकालक इतिहासकेँ निम्न प्रकारें विभाजित कएल अछि –
1. 1500 ई. पू. सँ 800 ई. धरि उद्भव एवं अविकसित साहित्य,

2. 800 ई. सँ 1200 ई. धरिक अवधिमे रचित साहित्यकेँ प्रारम्भिक एवं विकासक साहित्य तथा

3. 1200 ई. से 1400 ई. धरिक अवधिमे रचल साहित्यकेँ समृद्ध साहित्य मानल अछि।

साहित्यक काल-निर्धारणक लेल सर्वप्रथम आवश्यक अछि जे ओहि कालक रचना उपलब्ध हो। सामग्री उपलब्ध भेलापर भाषाक विकासात्मक विवेचन आवश्यक होइछ। यद्यपि राजेश्वर झा मैथिली साहित्यक आदिकालक आरम्भ 1500 ई. पू. सँ मानल अछि। किन्तु तेइस सए वर्षक साहित्य जकरा ओ अविकसित साहित्य कहल अछि, बानगी प्रस्तुत करबामे असमर्थ छथि। ओ वाल्मीकि रामायणसँ गुह्यसमाज तन्त्र, ज्ञानसिद्धि साधनामाला, ललित विस्तर आदि मे मैथिली शब्दक प्राचीन प्रयोग पबैत छथि आ प्रमाण स्वरूप दू चारिटा शब्द प्रस्तुत कएल अछि। किन्तु दू चारिटा शब्दक उपस्थितिसँ ओकर प्रयोगक सन्दर्भ तथा तकर विकास एखनधरि कोना भेलैक अछि, से स्पष्ट नहि होइछ। तात्पर्य जे साक्ष्यक अभावमे राजेश्वर बाबूक तर्क कमजोर छनि। भाषाक विकासक रूपरेखा प्रस्तुत करबाक बदलामे ओ ओहिकाल खण्डक राजनीतिक आ सामाजिक इतिवृत्तिमे लेपटा गेल छथि आ तें प्रतिपाद्य छूटि गेल।

‘अवहट्टक उद्भव ओ विकास’मे राजेश्वर बाबू अपन प्रतिपाद्यकेँ प्रस्तुत करबामे असमर्थ भए जाइत छथि। अवहट्टक प्रसंग लिखने छथि- ‘पूर्वीय भारतीय भाषाक विकासक जे अवस्था अवहट्टक नामसँ प्रख्यात अछि ओकर प्राचीनरूप अपभ्रष्ट थिक।’ आ तकर वाद ओ पतञ्जलि, भरत आदिक मत प्रस्तुत करैत छथि। अवहट्टक सीमा-रेखा कोन ठामसँ अछि सर्वप्रथम कोन ठाम एकर प्रयोग भेल, से प्रामणिक ढ़ंगे कहबा मे असमर्थ छथि। अवहट्ट केवल पूर्वीय भारतमे प्रचलित छल से नहि, पश्चिमो भारतमे प्रचलित छल। ओकरो विकास होइत गेलैक अछि। ओहू विकासक वर्गीकरण भेल अछि। किन्तु राजेश्वर झाक जे विवेचन अथवा वर्गीकरण अछि ओहिमे कोनो मौलिकता नहि अछि, जे समक्ष अबैछ ओ थिक चर्चित चर्वण। एकटा आरो फरिछा कए कहल जा सकैछ जे अवहट्टक प्रसंग अनेको विद्वानक मतक अप्रमाणिक संग्रह मैथिलीमे राजेश्वर बाबू कएने छथि। दशम शताब्दीमे अपभ्रसकेँ लौकिक भाषाक रूपमे प्रचलित पबैत छथि मुदा जखन विवेचना अथवा मत प्रतिपादनक बेर अबैछ तँ 1160 ई. क ‘सर्वानन्द टीका सर्वस्व’क लौकिक प्रहेलिका उपस्थित करैत छथि। असम्बद्धताक दोष एहिमे नहि छैक से नहि, कौखन ओहनो सामग्री प्रस्तुत भए गेल अछि जकर विषयसँ कोनो मेल नहि छैक।

अनेको असम्बद्ध विषयक उल्लेखक बाद अवहट्टक जे विशेषता प्रस्तुत कएल अछि राजेश्वर झाक प्रतिपादनसँ निष्पन्न नहि होइछ। अपितु डा. गजानन वासुदेव तगारे आ डा. तेसरीक मतक उल्लेख करैत छथि। अनेक अधीतो विद्वानक मतक उल्लेख करब लेखकक गहन अध्ययनशीलताक तँ परिचय अवश्य दैछ, मुदा तदुपरान्त लेखकक जे अपन मान्यता निष्पन्न होइछ, से नहि भए पबैछ। राजेश्वरझाक आनो शोध सम्बन्धी पोथीमे एहि प्रकारक स्खलन अछि।

ऐतिहासिक किंवा पौराणिक कथाक आधार पर लिखित पोथीक संख्या अधिक छनि। तकर प्रमुख कारण अछि जे राजेश्वर बाबू एक तेहन संस्थानसँ सम्बद्ध छलाह, जाहिठाम विविध विषयक पौराणिक अथवा ऐतिहासिक पोथीक संख्या विशेष छैक। ओहि पोथी सभक अनवरत अवलोकन राजेश्वरबाबूकेँ अपन मातृभाषामे ओहि विषयक पोथी लिखबाक प्रेरणा देने होएतनि। आ जँ राजेश्वर बाबूक एहि पोथी सभक मूल्यांकन हुनक मातृभाषा प्रेमकेँ ध्यानमे राखि करी तँ विशेष लाभकर प्रतीत होएत, ओकर मूल्यांकन नीक जकाँ कएल जा सकैछ।
ऐतिहासिक किंवा पौराणिक कथाक आधार पर लिखित कतेको पोथीक नामक संग राजेश्वर बाबू नाटक जोड़ि देने छथि। एहि पोथीक अवलोकनसँ इएह प्रतीत होइछ जे नाटकक विषय-वस्तु केहन होएबाक चाही, डायलाॅेग केहन होयबाक चाही, स्थान, काल आ पात्रमे कोना सामंजस्य कएल जएबाक चाही, राजेश्वर बाबू ध्यान नहि दैल छलाह। आ प्रायः एही हेतु राजेश्वर बाबूक ओ पोथी जकर नामक संग नाटक शब्द जोड़ल अछि, से ने तँ मंचोपयोगी नाटक थिक आने सुपाठ्य। किन्तु, एहि सभक सबसँ पैघ विशेषता अछि जे अेा मिथिला, मैथिली एवं मैथिलीक प्रति प्रगाढ़ प्रेम जगएबाक भावनासँ ओतप्रोत अछि। जे लेखकक मातृभाषाक प्रति प्रतिवद्धताक द्योतक थिक।

‘दुखिया बाबाक खटरास’‘अपरिणीता’ राजेश्वर बाबूक सर्जनात्मक प्रतिभाक द्योतक थिक। एहि दूनू पोथीमे राजेश्वर बाबू कल्पनाक आधार लेलनि अछि। ‘दुखिया बाबाक खटरास’क प्रसंग स्वयं लिखने छथि ‘हुनक नाम-धामसँ कोनो सम्बन्ध नहि रहि मात्र हमर कल्पनाक आधार छनि जकर उपकरण कौतुक प्रियता आ चातुर्य थिक। एहिमे सात गोट कथा संगृहीत अछि। सामान्यतया एकरा व्यंग्यपरक कथा कहल जा सकैछ। मुदा केवल व्यंग्ये धरि सीमित नहि राखि प्रभावक तीव्रताकेँ स्थिर रखबाक बदलामे स्पष्टरूपें भूमिकामे उपदेश देल अछि, जे प्रभावकेँ छितरा दैछ। मुदा एहि पोथीक भाषा अपन विशेषताक कारणें गद्य साहित्यक नमूना बनि गेल अछि। गाम-घरमे प्रचलित शब्दक प्रयोग जेना ओ गाँजमे छानि कएने होथि। ई लेखकक भाषा-संवेदना, शब्दक परिचय आ प्रयोगकेँ द्योतित करैछ।

राजेश्वर झाक व्यक्तित्व ओ कृतित्वकेँ जँ तराजूक पलरा पर राखल जाय तँ कृतित्वक अपेक्षा व्यक्तित्व विशेष भरिगर भए जएतनि। किएक तँ राजेश्वर बाबू प्रेरणाक काज बड़ करैत छलाह। लोककेँ लिखबाक लेल प्रेरित करैत छलाह। कार्यक्रम आयोजित कए लेखक ओ विद्वान लोकनिकेँ नव-नव विषय पर सोचबाक लेल विवश करैत छलाह। आ एहि काजक लेल ओ स्मरणीय रहताह। ओहि महान व्यक्तित्वक निधन 23 अप्रैल,1977 केँ पचपन वर्षक वयसमे भए गेलनि।

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