मैथिलीक प्राचीनता :: प्राकृतपैंगलम आ मैथिली

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मैथिली भाषा आओर साहित्यक स्थान भारतीय भाषा मध्य महत्वपूर्ण अछि। कलकत्ता मैथिली संघ द्वारा प्रकाशित विद्यापति पर्व अंकक 1961 के अंक में प्रसिद्ध इतिहासकार राधाकृष्ण चौधरी के निबंध प्रकाशित भेल छन्हि ; प्राक् विद्यापति कालीन मैथिली, जहिमें मैथिलीक प्राचीनता पर संक्षिप्त विचार लिखल गेल अछि (शायद प्रथम बेर इतिहास में, नै त बाकी जानकारी अंग्रेजी में उपलब्ध रहल अछि सामान्य मैथिलजन हेतु)।
मोथिली लिपिक प्राचीनतम सबसँ पैघ प्रमाण ई जे ‘ललित विस्तर’ मे एकर उल्लेख अछि; आदित्यसेन (सातम शताब्दी)क अभिलेख एहि लिपि में अछि, धर्मस्वामीन एकर उल्लेख वैवर्त लिपि नामे कएने छथि; ल.स. ६९क एक माटिक मुद्रा पर मिथिलाक्षर लिखल भेटल अछि; खोजपुर (दरभंगा) सँ ल.सं. १४७क। एकर अतिरिक्त मिथिलासँ जतेक अभिलेख आओर सिक्का लेख भेटल अछि सब मैथिली लिपि में अछि – तैँ एकर वैज्ञानिक अध्ययनक आवश्यकता। आचार्य परमानन्द शास्त्री मैथिली लिपिक वैज्ञानिक अध्ययन मिथिला मिहिरक पृष्ठक माध्यमसँ प्रस्तुत कयने छथि जे स्तुत्य अछि। अकबरकालीन मिथिलाक्षरक एक अभिलेख गोड्डा (संथाल-परगना)क एकटा मंदिर सँ प्राप्त भेल अछि आओर ओकर प्रतिलिपि काशीप्रसाद जायवाल संस्थान, पटना में सुरक्षित अछि।
लिपिक संगहि मैथिली भाषा सेहो बड्ड प्राचीन अछि आओर सिद्ध लोकनिक भाषा एकर सबसँ पैघ प्रमाण थिक। तिब्बती बौद्धधर्मक प्रसिद्ध रूसी विद्वान वसिलज्यु (Wassilijeu) अपन एक लैख में एकठाम लिखने छथि जे सिद्धकवि लोकनि अपन-अपन मातृभाषा में गीत लिखने छलाह।
साहित्य निश्चित रूपेँ ज्योयिरीश्वरक पूर्वहिं एक निश्चित शैली पर पहुँच चुकल छल अन्यथा लोरिक सन वीरकाव्य अथवा वर्णरत्नाकर सन महान ग्रंथक रचना तँ हठात् नहिए भय गेल होयत।
“प्रकृत-पैंगलम्” वा कृष्णदत्तक मैथिलीक उल्लेख तँ डॉ. जयकांत मिश्रक History Of Maithili Literature तक में नहिं भेल अछि। (कृष्णदत्त मैथिल पर डॉ. राधाकृष्ण चौधरीक लेख Journal Of The Bihar Research Society मे छपल अछि।)
बंगला भाषाक सुप्रसिद्ध विद्वान

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