Ramashray Jha Ramrang


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Ramashray Jha Ramrang
रामाश्रय झा“रामरग”(१९२८-२००९ )

विद्वान,वागयकार,शिक्षक आऽ मंच सम्पादक
भारतीय शास्त्रीय संगीतक समर्पित आऽ विलक्षण ओऽ विख्यात संगीतज्ञ पं रामाश्रय झा ’रामरंग’केर जन्म 11 अगस्त 1928 ई. तदनुसार भाद्र कृष्णपक्ष एकादशी तिथिकेँ मधुबनी जिलान्तर्गत खजुरा नामक गाममे भेलन्हि। हिनकर पिताक नाम पं सुखदेव झा आऽ काकाक नाम पं मधुसदन झाछन्हि। रामाश्रयजीक संगीत शिक्षा हिनका दुनू गोटेसँ हारमोनियम आऽ गायनक रूपमे मात्र 5 वर्षक आयुमे शुरू भए गेलन्हि। तकरा बाद श्री अवध पाठकजीसँ गायनक शिक्षा भेटलन्हि।
15वर्ष धरि बनारसक एकटा प्रसिद्ध नाटक कम्पनीमे रामाश्रय झाजी कम्पोजरक रूपमे कार्य कएलन्हि। पं भोलानाथ भट्ट जी सँ25 वर्ष धरि ध्रुवपद, धमार, खयाल,ठुमरी, दादरा,टप्पा शैली सभक विधिवत शिक्षा लेलन्हि।

पं भट्ट जीक अतिरिक्त्त रामाश्रय झा जी पंoबी.एन. ठकार (प्रयाग), उस्ताद हबीब खाँ (किराना), पं बी.एस. पाठक (प्रयाग) सँ सेहो संगीतक शिक्षा प्राप्त कएलन्हि।
पं झा 1954सँ प्रयागमे स्थाई रूपसँ रहि रहल छथि।1955 ई.मे हिनकर नियुक्त्ति लूकरगंज संगीत विद्यालयमे संगीत अध्यापक रूपमे भेलन्हि। 1960 ई. मे हिनकर नियुक्त्ति प्रयाग संगीत समितिमे भेलन्हि, जतए 1970 धरि प्रभाकर आऽ संगीत प्रवीण कक्षाक शिक्षक रहलाह। 1970 मे इलाहाबाद विश्वविद्यालयक संगीत विभागाध्यक्ष श्री प्रो. उदयशंकर कोचकजी पंझाक संगीत क्षेत्रक सेवासँ प्रभावित भए विश्वविद्यालयमे हिनकर नियुक्त्ति कएलन्हि। पं0 झा उत्कृष्ट शिक्षक, गायक आऽ आकाशवाणीक प्रथम श्रेणीक कलाकार छथि।

पं झा संगीत शास्त्र केर श्रेष्ठ लेखक छथि आऽ हिनकर लिखल अभिनव गीतांजलि केर पांचू भाग प्रकाशित भए चुकल अछि, जाहिमे 200सँ ऊपर रागक व्याख्या अछि आऽ दू हजारक आसपास बंदिश अछि।

मिथिलावासी श्री रामरंग राग तीरभुक्त्ति,राग वैदेही भैरव,आऽ राग विद्यापति कल्याण केर रचना सेहो कएने छथि आऽ मैथिली भाषामे हिनकर खयाल’रंजयति इति रागः’केर अनुरूप अछि।

अभिनव गीतांजलि, हुनकर उच्चकोटिक शास्त्र रचना अछि,जे पाँच भागमे अछि। अपन साहित्यिक वाणी, शाब्दिक रूप जे होइत अछि कोनो संगीत रचनाक,आऽ धातु जे अछि स्वरक लयक रचना आऽ एहि सभ गुणसँ युक्त्त छथि “रामरंग”।

रामरंगमे संगीतक लाक्षणिक तत्त्व प्रखर होइत छन्हि। संगीतक व्याकरणक सम्पूर्ण पकड़ छन्हि, जाहिसँ उचित शब्दक प्रयोगक निर्णय ओऽ कए पबैत छथि। छन्द शास्त्रक, कोषक, अलंकारक, भावक आऽ रसक वृहत् ज्ञान छन्हि रामरंगकेँ। संगहि स्थानीय संस्कृतिक,विभिन्न भाषाक आऽ ललित कलाक सिद्धान्तक सेहो गहन अध्ययन छन्हि रामाश्रय झा जीकेँ। वादन, गाय आऽ नृत्यक,साधल-कण्ठ,लय-ताल-काल, देशी राग,दोसराक मनसमे जाऽ कए बुझनिहार, नव लय आऽ अभ्व्यक्त्ति, प्रबन्धक समस्त ज्ञान,कम समयमे गीत रचना, विभिन्न मौखिक संरचना निर्माण,आलापक प्रदर्शन आऽ गमक एहि सभटामे पारंगत छथि रामरंग।