मैथिल समाज मे लुप्त होइत किछु सांस्कृतिक वर्ग परम्परा | पमरिया ——

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मैथिल समाज मे लुप्त होइत किछु सांस्कृतिक
वर्ग परम्परा |

पमरिया ——

मिथिलाक अनेक गाम मे मुसलमान जाति मध्य एक वर्ग पमरियाक होइत छल जे अपन अरिसर परिसरक समाज मे बच्चाक जन्मक उपरान्त गीत गाबि नाचि बधैया मँगैत छल |ओना किछु लोकक कथनानुसार ई मुग़ल कालीन परम्परा अछि |मुग़ल शासक लोकनि पमारिया रूप मे अपन गुप्तचर राखैत छलाह जे समाजक गति विधिक सूचना शासक वर्ग केँ दैत रहैत छल | कालान्तर मे आबि एहि मे किछु अवगुण सेहो प्रवेश कए गेल |समाज मे एहनो गलंजर पसरल जे पमारिया लोकनि समाजक देखनुक कन्याक सूचना शासक कए दैत छथि आ ओ सभ कन्याक अपहरण कए लैत अछि |संभव अछि एक आधटा एहन घटना घटित भेल हो |मुदा समाजक सर्व साधारण हेतु पमरिया आनंद आ मनोरंजनक साधन छल |पारिवारिक सुख आनंदक समय ई लोकनि नाचि गाबि प्रसन्नताक बृद्धिये करैत छलाह |ई पारिश्रमिक रूप मे यथा प्राप्त कपरा लत्ता ,गहना ,द्रव्य आ अन्न प्राप्त कए अपन परिवारक गुजड़ वसर करैत छलाह पमारिया जातिक मुसलमान रहितो ,मिथिला ,मैथिल आ मैथिलीक सांस्कृतिक पोषण आ परिराक्षण करैत रहैत छलाह |ओ लोकनि बच्चाक जन्मक अवसरक कालक प्रचलित गीत यथा ,सोहर ,झुम्मरि,कजरी ,गुआलरी ,लगनी ,तिरहुत बधैया आदि गाबि गाबि समाज कए मनोरंजन प्रदान करैत छलाह |ई लोकनि पटका ,घघरा पहिरि ढोलक ,खजुरी आ झालि बजाए नचैत गबैत छलाह| आउ ,मिथिला मे पमरिया द्वारा ब्यबहृत किछु गीतक बानगी प्रस्तुत करी …
सोहर
जानमल नन्द गोपाल ,बधावा बाजल रे !
लालनारे ,सुनितहिँ नगरक ग्वाल बाल सुख पागल रे |
पाटंबर परिधान ,स्वर्ण आभूषण रे |
लालनारे!यशोदा मणि-मांणिक्य, लुटाव रतन धन रे !
नन्द विप्र गण देल, भवन भू गोधन रे !
ललना रे !याचक भेल अयाचक,पाबि अतुल धन रे ||
अति आनंद समाज ,नन्द घर आबय रे ,
ललनारे ,जकरा जे औकात से ताहि लुटाबय रे !
छंद– ..गीत मंगल गाव गोपी ,व्रज आनंद अपार हे !
जगत पालनहार लेलनि ,नन्द घर अवतार हे !
असुर गण संहारि करता, हरण धरती भार हे !
धर्म बाढ़त पाप भागत ,संत सुख संसार हे !
पुनःश्च
कहवाँ हरिजी जनमल ,कहवाँ प्रगट भेल रे!
ललना रे !करिय मधुर स्वर गान ,मेघ जल बरिसत रे !
छंद ….नन्द हरख जनाय वसुदेव ,पुछथि देवकी बिचार यौ ,
रचब कोन उपाय भामिनि,अछि सुतल रखवार यौ !
सूतल छथि रखवार ,कि हँसि कहु बालक रे !
ललनारे ,लय चलू नंदक द्वार ,जतय प्रतिपालन रे !
छंद ..प्रतिपाल भवन नुकाय वसुदेव ,मेघ बरसु अपार रे !
घाट यमुना पाट लागल ,कृष्ण उतरथि पार यौ !
सुर मुनि गण सभ आएल ,फुल बरिसाएल रे ,
लालनारे ,सभ मिल नन्द दुआर कि सोहर गाएल रे !
आब देखू एकटा बधैयाक नमूना …
बधैया
बाँझ घर ने जेबै ,मरौंछी घर ने जेबै ,
दय दियऽदान चुकाय , बबुआ के बधैया !
कंगन लेबै हे ,नुनुआ के बधैया |
सुनु राजा दशरथ ,रानी कोशिलिया .
रतन लेबै हे ,बबुआ के बधैया |
केओ लुटाबय हाथी ओ घोड़ा ,
केओ लुटाबय हथकंगना हे ,बबुआ के बधैया |
बाबा लुटाबय ,अनधन सोनमा ,
बाबी लुटाबय हथ कंगना हे !बबुआ के बधैया |
एबम् –प्रकारेँ अनेक लय ,धुन आ भास पर बधैया गाबि २ अदत्तो लोकनिक ह्रदय मे उदारताक भाव समाहित करबा मे सक्षम सिद्ध होइत छल |आब एहि परम्पराक सर्वथा लोप भय गेल अछि | ओहो वर्ग आब अपन परिवारक पालन पोषण हेतु आन आन ब्यबसाय मे लागि गेल अछि | हमरा गाम लग एकटा मिथिला दीप नामक गाम अछि ,जे पमरियाक गाम कहबैत छल ,मुदा आब पमरियाक पेशा पूर्व पमरियाक संतानों लोकनि त्यागि देल अछि |

भाट [चारण ] …

जखन राजा ,महाराजाक युग
छल तखन भाट वा चारण गण अपन पोषक
स्वामीक गुण गान करैत छलाह |दरवार मे कवि ,पंडित ,पहलमान ,गुणवान आ कलाविद् लोकनि
पर्याप्त पोषण पबैत छलाह | काव्य ,कला ,गुणज्ञ राजा लोकनि काव्य कलाक
रसास्वादन करैत छलाह |युग परिवर्त्तनक संग
राजा लोकनिक युग गेल आ ई कौलिक ब्यबसाय
बला भाट चारण लोकनि निराश्रित होमय
लगलाह |एहना स्थिति मे समाज एहि विद्वद
परिवारक पोषण हेतु पश्रय देल | हिनका
लोकनि केँ शुभ मांगलिक अवसर पर जुटल समाज
यथा मुंडन ,उपनयन विवाहक अवसर पर बरियाती
सरियातीक मध्य शान्ति पाठ ,श्लोक वाचन ,काव्य आ रोचक ,मनोरंजक रचना सुनाय वरपक्ष
आ कन्यागत सँ किछु विदाय वा पुरस्कार
प्राप्त कए लैत छलाह |एम्हर आबि समाजक
लोकक मानसिकता मे अंतर आबय लागल |लोक
परपरागत आचार त्यागि नवीन
आडम्बर केँ अपनाबय लागल | आब विवाह मे ध्वनि बिस्तारक ,सौन्ड बॉक्सक द्वारा
सिनेमा गीतक प्रसारण तथा डीजे यंत्रक माध्यमे नाचब कूदव केँ प्रश्रय दैत अछि |आइ
जेना समाज मे पंडित आ पुरोहित लोकनि अपन कौलिक ब्यबसाय त्यागि आन आन काज मे लागल जैत छथि तहिना समाजक उपेक्षा आ अदेयता निरखि परखि,सांस्कृतिक ह्रास अनुमानि चारणों समाज परम्परागत एहि विद्वद् परम्परा केँ त्यागि आब आन आन काज मे लागि गेलाह अछि |चारण लोकनि संस्कृतग्य ,कवि ,आ लोक ख्यातिक विद्वान होइत छलाह | ई समाजक समक्ष एहन उपदेशात्मक काव्य पाठ करैत छलाह जाहि सँ मानव मे मानवता ,शील ,विवेक ,त्याग ,आ करुणाक शिक्षा प्राप्त होइत छल |सम्प्रति हमर आयु करीब ७०वर्षक अछि आ हम अपन विवाह आ एन्य अनेक अवसर पर विद्वान भाट केँ सुनबाक लाभ प्राप्त कएल अछि |एकटा संस्मरण हमरा नीक जेकाँ स्मरण अछि | अपन दीदीक बिवाहक अवसर परक | ओहि प्रसंग जतबा स्मरण अछि तकर एकटा अति संक्षिप्त बानगी उदाहराण लय राखि रहल छी |बरियातीगण जखन दलान पर आबि बैसलाह आ शरवत पानक बाद बरियाती आ सरियाती मे परस्पर परिचय पात आ नाना प्रकारक प्रश्नोत्तर भेल |एकर उपरान्त जखन वातावरण शाँत भेल तखन लहटा गामक पंडित तेजनाथ महाराज जे ,साँची धोती ,चपकन आ पाग पहिरने ,दोपटा ओढने उठि केँ ठाढ़ भेलाह आ :”गणानान्त्वा गणपति ग्वं आ शांति वाचनक सस्वर पाठ करैत करीब दसटा श्लोक गणेश बन्दनाक गायन केलन्हि|तदुपरांत गिरिजा मंगल काव्यक रागबद्ध पाठ प्रस्तुत कएल | एकर बाद ओ शिव विवाह आ राम विवाहक प्रसंग रुचिर काव्य सुनाओल |पुनः पंडितजी धारा प्रवाह एकक बाद दोसर काव्य पढ़ब प्रारम्भ कएल |एही क्रम मे प्रसिद्द संस्कृत काव्य ग्रंथक मनोहर श्लोक एकक बाद दोसर तेसर सुनबैत रहलाह |ओ हिन्दी मे तुलसी ,सूर ,मीरा , भूषण ,घनानंद ,गिरिधर ,पद्माकर तथा चंदवरदाईक कविता सुनाओल |अंत मे मैथिली भाषाक सूत्र ग्रहण कय विद्यापति ,गोबिंद दास ,उमापति ओ चंदा झाक रामायणक रोचक प्रसंग सुनाओल |सभटा तँ नहि मुदा राम विवाहक अवसर पर मिथिला आ मैथिलीक जे मधुर मोदमय काव्य सुनाओल ताहि मे तीन प्रसंग सुनल जाए .जखन जनकपुरक सीमा पर बरियाती आएल आ मिथिलाक सरियाती स्वागत हेतु पहुँचलाह ,तखनुक दृश्य …
“जनकपुरक सीमाक निकट आएल बरियाती ,|
स्वागत करबा हेतु ओतय जुमला सरियाती |
धोती ,चपकन ,मिर्जई ,दोपटा पाग सुसज्जित |
,
वेष सुवेष ओ विनय देखि सभ भाव निमज्जित|
वर रामक रथ निहुछि-निहुछि ,मणि माणिक लुटबथि |
देखि चकित आश्चर्य कियो मैथिल नहि उठबथि |
बरियाती मणि उठा उठा केँ राखय लागल |
दृश्य देखि केँ दशरथ नयना लज्जा जागल |
डपटि केँ बजला ,रुकह ,देखि केँ लोक की कह्तहु |
सभ कंगाल अयोध्या केर भिखमंगा बुझतहु |
एना लूटि नहि करह ,लोभ केर करह संबरण ,
ई कौतुक बनि जाएत, मिथिला हास्यक कारण |
पुनः मिथिला नगर आ ओकर वैभव देखि राजा दशरथ आ बरियातीक की स्थिति भेल से द्रष्टब्य …
“करितहिँ नगर प्रवेश ,चकित अवधेश भेला ,
कहलनि सुमंत सँ की अएलहुँ कुबेर नगर ?
कनक ,रतन ,मणि खचित ,सभटा अछि भव्य भवन ,
ऐरावत ,उच्च्श्रवा ,बान्हल अछि घरे घर |
डोमक घर निकट आबि रथ केँ रोकबाय देल,
भव्यता ओ वैभव लखि, बूझल मिथिलेशक घर |
स्वर्ण पात्र मणि खचित बाहड़ लागल अमार ,
कथमपि ई संपदा ने भय सकैछ आनक घर |
बरियाती ठाढ़ देखि बहरेला डोम राज .,
क्षमा करव बढल जाओ ,आगू कृपा निधान |
जनकपुरक सभ सँ ई दीन हीन डोमक घर ,
मिथिलाकेर अतिथि सँ हम लै छी नहि ग्रहण दान ||
जनक राज भवन नित्य भोजन उपरान्त पात्र ,
फेँकि देल जाइछ हम तकरे एकत्र करी |
राखब जोगाय से ,खाली भण्डार नहि ,
तेँ तँ ई कनक पात्र , गेँटि बाह्ड़े धरी||
तेसर प्रसंग परिछन कालक परिहासक अछि ….
गोर नार दशरथ नृप ,गोरि छथि कौशल्या माँ ,
तखन किए रामभद्र ,श्यामल छथि बहिना ?
अवश्यमेव एहि मे रहस्य कोनो गूढ़ अछि ,
कुलटा छथि माए हिनक पाहुन सँ कहब कोना ?
लोक कहय खीर खाय बालक जन्मौलन्हि अछि
सत्य तथ्य श्रृंगी सँ ई सनेस पौलन्हि अछि |
अज छलाह पितामह ,हिनक शुद्ध अजा बंश ,
दश रथ केर सारथी पिता से सुनौलन्हि अछि |

बखो -बखौनी —– …

इहो मुसलमान जातिक एक प्रजाति अछि,नट ,कजरटनी जेकाँ बखो ,बखौनी |ई पति पत्नी वा पुरुष स्त्रीक रूप मे समाजक शुभ मांगलिक अवसर पर खजुरी पर गीत नाद गाबि बधैया मँगैत छल |ई लोकनि सोहर ,बधैया,तिरहुत ,नचारी ,डहकन आ अन्य लोक प्रिय गीत गाबि लोक रंजन करैत छल | आउ,बखो बखौनी द्वारा ब्यबहृत एकटा डहकन के नमूना पेश करी .जे हास्य आ ब्यंग्य सँ परिपूरित अछि ,आ समाज सँ हास्य मोदमय एहन गीत सभ लोप भेल चल जैत अछि

१, डहकन

भौजी ननदि केँ झोंटा धय धय केँ घिसीयाबै छै
,दियर केँ ठेलि भगाबै छै ना !
ननदि केँ कहलनि नगर उजारनि ,हे ,दाय ! असली अँह कुल तारनि,
छिनरिया ,कुलक प्रतिष्ठा गाडनि,नाम हँसाबै छै ,गाम समाज घिनाबै छ ना !
ननदी बजली ठुनका मारि ,भौजीक सात पुश्त केँ तारि,दय केँ बिखिन्न बिखिन्न गारि, ई तँ ससुरो मे मूडी छुड़ी फनकाबै छै ,बापक जुमुस देखाबै छै ना |
गीतक माध्यमे ई उतरा चौरी आ हास परिहास आब बखो बखौनीक अभाव मे लुप्त भेल जैत अछि
| ताहू सँ बेसी रसमय अछि ई श्रृंगार रसपक्षक डहकन जे सरहोजि अपन नन्दोसि सँ कहि रहलि छथि से कतेक उपयोगी काम शिक्षाप्रद अछि से देखू ….

२,डहकन

चालि सुनटा चलू यौ , मोहन रसिया !
बात उनटा कहू नै ,सजन रसिया |
कांच कली नै लिबा केँ तोडू ,तन्नुक डारि ने एना मचोडू ,
रूसि ,फूलि केँ मुँह नहि मोडू ; बुझि गमि प्रेमक नाता जोडू ,
हाल रातिक कहू यौ ,मोहन रसिया |
गाछ सबूरक मेवा फरइछ ,धैर्यक वासन अमृत
भरइछ,
कते काल क्यों जिद्द मे अरइछ ,अगुतेने अथाह मे परइछ ,
माथ एना नै धुनू यौ ,मोहन रसिया |

हकपारा ——
प्रत्येक साल अगहनक उपरान्त जखन गाम घरक गृहस्तक घर मे धान तैयार भऽ जैत छल तँ हकपारा अबैत छल| जोड़ सँ हाक पारबाक कारणेँ एकर नाम हकपारा पड़ि गेल | ई अद्भुद २ फकड़ा आ कविता ,छंद सुनाय एक पाव सँ सेर भरि धान माँगि लय जैत छल | इहो एकटा मैथिल समाजक कम बेस सांस्कृतिक पक्ष छल | हकपारा कथित एकटा फकड़ा सुनल जाए …..
१, मोट मोट अल्हुआ घुरा मे देल ,बुढियाक चरखा टनमन भेल |
चरखा चलय माल घुघुआय ,चौदह अल्हुआ गाल तर जाए |
बुढिया दाय बड़े रगरी ,माँर पिबथि साढ़े सात गगरी |
बडकी पुतौहुआ केँ नैहर पठाय ,मैझली खुऔलक नोन पढ़ाय ,
छोटकी पुतहुआ बड दुलरी , बुढिया के मारय अनेक मुँगरी |
२, सासु पुतहु मे झगडा भेल ,भागि पुतहुआ नाहिरा गेल ,
बेटा कहलक सुन गै माए ,बनलेँ जानक तोहूँ बलाय ,
कह ,दूनू मे ककरा त्यागब ,घर छोड़ि के कतय भागव ?
अँह किए घर केँ त्यागब बाउ ,कहू अहीँ हम कतय जाउ ?
कोना केँ पोसल सेहो बिसरलहुँ, कहियो मरब से आइये मरलहुँ |
ओसभ फकडे कहैत बच्चा सभ केँ सेहो नीतिक शिक्षा दैत छल .
.
३, अर दर बाजब, पाछू कानब , सीखब नै तऽ किछु ने जानब ,
जँ गुरुजन के कहब ने मानब,अपनेँ तालेँ नाचब फानब ,
पैघ लोक सँ झगडा ठानब ,उनटे काल नोति घर आनब |
हकपारा लोकनि कखनहुँ२ रोचक भक्ति काव्य सेहो कहैत छल एकटा बानगी तकरो सूनू ..
४, एक दिन फ़ँसान फसल तुलसी हनुमान मे,
सभ सँ प्रिय राम केर हमहीं हनुमान छी |
देलहुँ हम राम केँ चिन्हारय रचि रामायण ,
इहो ने जनैत छी ? कत्ते अनजान छी ?
हँ,यौ ,जँ जिबतथि राम तखन ने रामायण ?
सीता केँ हम खोजितहुँ नै ,तँ राम मरि जैतथि |
लछुमन लय संजीवनी हमहीँ ने अनलहुँ,
लछुमन बिना राम घुरि के नै अबितथि |
अहिरावण हरण कय लऽ गेल पाताल लोक .
तखन जाय एकसर हम फंद सँ छोडओलहुँ|
आब कहू तुलसीजी असली राम भक्त के ?
तुलसी कहलनि जानि बूझि हम तँ बजबौलहुँ|
आब अहीँ कहू उपरोक्त वर्गक लोप की सामाजिक सांस्कृतिक ह्रास्यक परिचायक नहि थिक ?
इत्यलम्
“मधुकर “
५-४-२०१३ ,


1 Comments

  1. हकपारा के संबंध में रोचक जानकारी भेटल। आब ई परंपरा लुप्त भ गेल। धन्यवाद आदरणीय एहन जानकारी लेल।🙏🙏🙏

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